ज़िंदगी अगर सरल होती ।
तो तुम शायद आज पास होतीं ।
तब हमारा मिलना सहज होता ।
यूँ स्वप्न मिलान की विवशता न होती ।
मैं और तुम बातें करने में न झिझकते ।
और न ही मिलने पर घेरते अपराधबोध ।
बल्कि प्रसन्नता से हम डूबते उतराते ।
दूर कहीं मस्त हिलोरों में खो जाते ।
हम अपनी मंज़िल तलाश कर ।
अपना आशियाँ बसाते ।
जिसमें गूंजती किलकारियां ।
दमकता तुम्हारा दीपशिखा सा सौन्दर्य ।।
और हर्षित उल्हासित सा मैं।
- संजय वर्मा
Great ! Bharate ... Kavi ho gaye ... Bharate !!!...
ReplyDelete